आज भी नही बन सका गिर्दा के सपनो का उत्तराखंड,

भले ही उत्तराखण्ड राज्य को अब 19 साल बीत चुके हो अलग राज्य लिये तमाम लोगो ने अपनी सहादत दी, लेकिन राज्य निर्माण आंदोलन में एक ऐसे व्यक्ति ऐसा भी थे जिसने 1994 के उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के दौरान अपने जनगीतों और कविताओं के माध्यम से पहाडी जनमानस को उत्तराखण्ड राज्य के निर्माण के लिए बडे प्रभावशाली ढंग से आंदोलित करने का काम किया, वो थे जनकवि गिरीश तिवाडी गिर्दा, जिनकी भरपाई करना बडा मुसकिल है।

गिर्दा आज भले ही हमारे बीच नही है मगर उनकी रचनाए आज भी हमारे दिलों मे जिन्दा है।  लखनऊ की सडकों पर रिक्सा खीचने के बाद गिर्दा ने आन्दोलन की ऐसी  राह पकडी कि वह  उत्तराखंण्ड मे आन्दोलनों के पर्याय बन गये, उन्होंने जनगीतों से लोगो को अपने हक-हकूको के लिये ना सिर्फ लडने की प्रेरणा दी बल्कि परिवर्तन की आस जगाई। उत्तराखण्ड के 1977 में चले बन बचाओ आन्दोलन, 1984 के नशा नही रोजगार दो ,और 1994 में हुये उत्तराखंण्ड आन्दोलन में गिर्दा की रचनाओं ने जान फुकी थी। इतना ही नही उसके बाद भी हर आन्दोलन में गिर्दा ने हर आन्दोलन मे बढचढकर शिरकत की, लेकिन  22 अगस्त 2010 को  अचानक गिर्दा की आवाज हमेशा के लिये खामोश हो गई।


ये गिर्दा के  जनवादी होने का ही प्रमाण था कि  समाज की कुरीतियां कभी उनके उपर हावी हो पायी। उन्हों ने रचनाओं से हमेशा राजनिति के ठेकेदारों पर गहरा वार किया । राज्य आन्दोलन के दौरान लोगो को एक साथ बाधने का काम भी गिर्दा ने किया । उस दौरान उनका उत्तराखंण्ड बुलेटिन काफी चर्चाओं में रहा। लेकिन इन सब से अलग खास ये था कि स्व0 गिर्दा ने जो बात अपनी रचनाओं के माध्यम से 1994 में कह दी वो सब राज्य बनने के बाद सत्य होता दिखाई दिया। इसके अलावा गिर्दा साथियों के साथ इतने मिलकर रहते थे कि आज भी उनके सहयोगी रहे उनहै याद करना नही भूलते है, कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि उत्तराखंण्ड मे गिर्दा की अहमियत महज एक कवि तक नही है। वह सही मायने मै एक दूरदर्शी आन्दोलनकारी थे उनकी मैात ने सूबे का सच्चा रहनुमा खो दिया है जिसकी भरपाई मुसकिल नही नामुन्किन है।

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